रचना तिथि : 2 नवम्बर 2016

एबेकस से कम्प्यूटर,
घड़ा से रेफ्रीजरेटर,
कभी मशीनों से बेकारी
शुरू हो रही, नई पारी
नए-नए आयाम खुल रहे हैं।
और हम संस्कार भुल रहे हैं।
मस्ती से अब मस्तीजादे,
मिट रही पुरानी यादें
नदी, तालाब और पोखरिया,
अबके स्विमिंग पूल रहे हैं।
और हम संस्कार भुल रहे हैं।
बैठे-बैठे सब काम हैं होते,
आभासी दुनिया में सपने संजोते
खत्म हुआ अब मिलना-जुलना,
अॉनलाईन ग्रुप खुल रहे हैं।
और हम संस्कार भुल रहे हैं।
धन्य हैं, लोग जो हल निकालते,
मुसीबतों में ही समाधान तलाशते
कितने आगे निकल गए,खोज करते-करते
और अपनी सीमा बढ़ाकर लड़ते-लड़ते
अब सभी कोने दुनिया के,
देखो, कैसे घुल रहे हैं।
और हम संस्कार भुल रहे हैं।





एबेकस से कम्प्यूटर,
घड़ा से रेफ्रीजरेटर,
कभी मशीनों से बेकारी
शुरू हो रही, नई पारी
नए-नए आयाम खुल रहे हैं।
और हम संस्कार भुल रहे हैं।
मस्ती से अब मस्तीजादे,
मिट रही पुरानी यादें
नदी, तालाब और पोखरिया,
अबके स्विमिंग पूल रहे हैं।
और हम संस्कार भुल रहे हैं।
बैठे-बैठे सब काम हैं होते,
आभासी दुनिया में सपने संजोते
खत्म हुआ अब मिलना-जुलना,
अॉनलाईन ग्रुप खुल रहे हैं।
और हम संस्कार भुल रहे हैं।
धन्य हैं, लोग जो हल निकालते,
मुसीबतों में ही समाधान तलाशते
कितने आगे निकल गए,खोज करते-करते
और अपनी सीमा बढ़ाकर लड़ते-लड़ते
अब सभी कोने दुनिया के,
देखो, कैसे घुल रहे हैं।
और हम संस्कार भुल रहे हैं।




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