Saturday, 24 June 2017

एक दिवस नेम (व्यंग्य)

दिवस मनाने की परंपरा...
दिवस का नाम तो सुना ही होगा। हाँ भाई, अंग्रेजी में उसे
"डे"  कहते हैं। साल में तो ऐसे कई दिवस आते हैं। पर उसमें कुछ हम भी मनाते हैं। जैसे - मदर्स डे, फादर डे,टीचर्स डे, वुमेन डे, और न जाने हम कितने लिख दे।पर भाई, उनके सम्मान के लिए एक ही दिन है, क्या? उनकी उपेक्षा न करें। अन्य दिन भी सम्मान दें।
ऐसे तो हर दिन माता-पिता के बातों को टालते हैं। क्यों एक ही दिन FB पर उनकी सेल्फी डालते हैं। क्लास की मस्ती याद ही होगी। लेकिन सिर्फ टीचर्स डे के दिन उनका अनुशासन मानते हैं। क्यों? एक ही दिन तिरंगे को सलाम करते हैं। बाकी दिन जहाँ भी हो, उसे आम करते हैं। हर दिन इंग्लिश बाबू बने फिरते हैं। क्यों? एक ही दिन हिंदी से जुड़ते हैं। हर दिन तो महिलाओं को परेशान करते हैं। एक ही दिन क्यों? सम्मान करते हैं। अन्य दिन के बारे में तो आप सोच ही सकते हैं। 
हमारी सभ्यता तो हर दिन सम्मान करना सिखलाता है। यह एक दिन तो कोरम पुरा करना कहलाता है।
अंत में,

सबों का सम्मान करें,
हर दिन आखिरी दिन की तरह कुर्बान करें।
और हाँ अगले सुबह उठे तो...
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ईश्वर को धन्यवाद जरूर करें।
क्या भाई? भगवान को भी भुल जाते हो। उन्हें भी हर दिन याद करो!!!! 

Note: ज्यादा सीरियस में मत लें।


©ANKUR DUTTA JHA

Thursday, 22 June 2017

हम संस्कार भुल रहे हैं|

रचना तिथि :  2 नवम्बर 2016

एबेकस से कम्प्यूटर, 
घड़ा से रेफ्रीजरेटर,
कभी मशीनों से बेकारी
शुरू हो रही, नई पारी 
नए-नए आयाम खुल रहे हैं। 
और हम संस्कार भुल रहे हैं। 

मस्ती से अब मस्तीजादे, 
मिट रही पुरानी यादें
नदी, तालाब और पोखरिया, 
अबके स्विमिंग पूल रहे हैं। 
और हम संस्कार भुल रहे हैं। 

बैठे-बैठे सब काम हैं होते, 
आभासी दुनिया में सपने संजोते
खत्म हुआ अब मिलना-जुलना, 
अॉनलाईन ग्रुप खुल रहे हैं। 
और हम संस्कार भुल रहे हैं। 

धन्य हैं, लोग जो हल निकालते, 
मुसीबतों में ही समाधान तलाशते 
कितने आगे निकल गए,खोज करते-करते 
और अपनी सीमा बढ़ाकर लड़ते-लड़ते
अब सभी कोने दुनिया के, 
देखो, कैसे घुल रहे हैं। 
और हम संस्कार भुल रहे हैं। 

 

©ANKUR DUTTA JHA

Monday, 19 June 2017

-:एक लोटे की आत्मकथा:-


आप बचपन मे एक पहेली सुना करते थे,-
"पथिक प्यासा क्यों? गदहा उदास क्यों? "
हम श्लेष अलंकार का उदाहरण देते हुए कहते थे-
"क्योंकी लोटा न था।"
जी हाँ, मैं लोटा ही हूँ। मेरा नाम तो आपने सुना ही होगा।
पहले मेरा असली स्वरूप तांबे अथवा पीतल में था। जिसमें रखा जल स्वास्थ्यवर्धक  होता था। और आप कई पेट की बीमारियों से बचे रहते थे। लेकिन अब मुझपर भी आधुनिक सभ्यता का असर पड़ गया है, और मैं स्टील का हो गया हूँ। जिसमें रखा जल उतना स्वास्थ्यवर्धक नहीं होता है।
आप न जाने मुझे कितने कामों में उपयोग किया करते थे। -
सुबह से लेकर शाम तक, घर से लेकर बाहर तक, खाने से लेकर नहाने तक, मैं एक सर्वउपयोगी वस्तु बन चुका था। मेरे उपयोग का स्वर्णिम काल कुछ समय पहले तक रहा है।
लेकिन आज आप मग-जग जैसी आधुनिक चीजों से निकटता बढ़ाकर मेरे अस्तित्व को समाप्त कर रहे हैं। लगता है कि यह अंग्रेजों की साजिश है। भारतीय संस्कृति को खत्म करने की, धन्य हैं वो कुछ गांवों के लोग जो आज भी मेरा उपयोग कई कामों में करते हैं।
काश! वह आधुनिक सभ्यता की चपेट में न आएं। मुझे एहसास हो रहा है कि मैं अपना अस्तित्व खोता जा रहा हूँ। कहीं मुश्किल से ही नजर आता हूँ। 
भोज में  मेरी  खोज नहीं  है। और  स्वच्छ भारत अभियान ने तो मेरी उपयोगिता ही खत्म कर दी। अब वह दिन दूर नहीं जब मैं इतिहास बन जाऊँगा। अंत में -
"मैं हूँ। लोटा  ,  अपना अस्तित्व खोता। "

©ANKUR DUTTA JHA




Wednesday, 14 June 2017

लौटा दो मेरा गाँव...

रचना तिथि: 2016

धुप खिली हो गई है। भोर
सुरज की किरणें फैली चारों ओर 
कहाँ गई कौवे की काँव-काँव
लौटा दो मेरा गाँव, लौटा दो मेरा गाँव

जब होती थी वो बारिश 
तो करते भीगीं ख्वाहिश 
जहाँ तैरते थे, कागजी नाव
लौटा दो मेरा गाँव 

कहाँ गई महक फूलों की 
और वो डाली झूलों की
जहाँ मिलती थी पेड़ों की छाँव 
लौटा दो मेरा गाँव 

नहीं रहा अब वह मैदान 
जहाँ लहलहाती सुनहरी धान
जहाँ दौड़ते थे, नंगे पाँव 
लौटा दो मेरा गाँव 

चला गया अब वो मौसम 
शरारत हो गई कम 
अब मैं किधर जाँऊ 
लौटा दो मेरा गाँव 



©ANKUR DUTTA JHA

महापर्व छठ

पूरब में फैल रही लाली व्रती देती अर्घ्य की थाली कब दर्शन देंगे ?दिवाकर भास्कर ,दिनकर, रवि, सुधाकर लेकर ईख ,नारियल, हल्दी डाला लेकर ...