Thursday, 26 January 2017

मना रहे हैं, आज गणतंत्र!

शीर्षक : मना रहे हैं आज गणतंत्र ! 
रचना तिथि : 26 जनवरी 2017

हम मना रहे हैं ,आज गणतंत्र !
पर क्या हम हो चुके स्वतंत्र 
बुराइयों के बेड़ी में जकड़े हुए 
अंधविश्वास को पकड़े हुए 
दुषित हो रहा, सारा तंत्र 
मना रहे हैं ,आज गणतंत्र !

सलाम कीजिए उनको जो 
सरहद पर लहु बहाते हैं। 
पर देश के प्रहरी को 
देश के लोग झुठलाते हैं। 
वे लोग हैं हवा  जो 
दिये को बुझा,आग लगाते हैं।
चंद कोरे कागज के खातिर, 
चमन को बेच जाते हैं ।
परेशान है हर आदमी की,
कैसा हो?देशप्रेम का मंत्र
मना रहे हैं आज गणतंत्र !

हमें उन पर है ,अभिमान 
जो ऊँचा रखते हैं ईमान 
आओ बनाए,सबसे प्यारा हिन्दुस्तान 
जहाँ तिरंगा बने अपनी शान
हर्षित हो मनाये यह त्योहार 
ताकि शहादत न जाए बेकार 
देशप्रेम का ऐसा गुलशन खिले 
कि अगले दिन ,
तिरंगा सड़कों पर न मिले । 

©ANKUR DUTTA JHA

Tuesday, 10 January 2017

नेता से बचाओ!

शीर्षक : नेता से बचाओ !
रचना तिथि : 13 अगस्त 2016



रघुपति राघव राजा राम
पहले पैसा बाद में काम
खादी पहन समझते महान
नेता बन गए नेटा समान
चाहे कोई घटना हो या खुदकुशी
नेताओं को चाहिए अपनी खुशी
खो चुके हैं,वे इज्जत और मान
महँगाई से भी पक गए कान
चाहे आई कोई सरकार महान
जनता की वे ले लेती जान
आरक्षण ले रहा हमारा प्राण
फेल अफसर बढ़ाते शान
इस आजादी को दुँ क्या नाम
फेयर लवली या झंडु बाम
यह है भारत हमारा महान
इसे नेता से बचाओ,हे भगवान!





©ANKUR DUTTA JHA

Monday, 9 January 2017

मैं भी कुछ लिखने लगा हूँ ।

शीर्षक:      मैं भी कुछ लिखने लगा हूँ। 
रचना तिथि:      9जनवरी 2017 


कर रहा था मैं इंतजार,
क्या लिखूँ मैं पहली बार
न था मुझे शब्दों का ज्ञान
जैसे तरकश बिना तीर समान
मेरे साहित्य में शब्दों की कमी थी।
पर सूखे रेगिस्तान में कुछ नमी थी।
शब्दों के अंकुर फुट पड़े थे।
और हम वहीं खड़े थे।
अभी अभी साहित्य में जगा हूँ।
मैं भी कुछ लिखने लगा हूँ ।


©ANKUR DUTTA JHA

महापर्व छठ

पूरब में फैल रही लाली व्रती देती अर्घ्य की थाली कब दर्शन देंगे ?दिवाकर भास्कर ,दिनकर, रवि, सुधाकर लेकर ईख ,नारियल, हल्दी डाला लेकर ...