Wednesday, 14 June 2017

लौटा दो मेरा गाँव...

रचना तिथि: 2016

धुप खिली हो गई है। भोर
सुरज की किरणें फैली चारों ओर 
कहाँ गई कौवे की काँव-काँव
लौटा दो मेरा गाँव, लौटा दो मेरा गाँव

जब होती थी वो बारिश 
तो करते भीगीं ख्वाहिश 
जहाँ तैरते थे, कागजी नाव
लौटा दो मेरा गाँव 

कहाँ गई महक फूलों की 
और वो डाली झूलों की
जहाँ मिलती थी पेड़ों की छाँव 
लौटा दो मेरा गाँव 

नहीं रहा अब वह मैदान 
जहाँ लहलहाती सुनहरी धान
जहाँ दौड़ते थे, नंगे पाँव 
लौटा दो मेरा गाँव 

चला गया अब वो मौसम 
शरारत हो गई कम 
अब मैं किधर जाँऊ 
लौटा दो मेरा गाँव 



©ANKUR DUTTA JHA

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