आप बचपन मे एक पहेली सुना करते थे,-
"पथिक प्यासा क्यों? गदहा उदास क्यों? "
हम श्लेष अलंकार का उदाहरण देते हुए कहते थे-
"क्योंकी लोटा न था।"
जी हाँ, मैं लोटा ही हूँ। मेरा नाम तो आपने सुना ही होगा।
पहले मेरा असली स्वरूप तांबे अथवा पीतल में था। जिसमें रखा जल स्वास्थ्यवर्धक होता था। और आप कई पेट की बीमारियों से बचे रहते थे। लेकिन अब मुझपर भी आधुनिक सभ्यता का असर पड़ गया है, और मैं स्टील का हो गया हूँ। जिसमें रखा जल उतना स्वास्थ्यवर्धक नहीं होता है।
आप न जाने मुझे कितने कामों में उपयोग किया करते थे। -
सुबह से लेकर शाम तक, घर से लेकर बाहर तक, खाने से लेकर नहाने तक, मैं एक सर्वउपयोगी वस्तु बन चुका था। मेरे उपयोग का स्वर्णिम काल कुछ समय पहले तक रहा है।
लेकिन आज आप मग-जग जैसी आधुनिक चीजों से निकटता बढ़ाकर मेरे अस्तित्व को समाप्त कर रहे हैं। लगता है कि यह अंग्रेजों की साजिश है। भारतीय संस्कृति को खत्म करने की, धन्य हैं वो कुछ गांवों के लोग जो आज भी मेरा उपयोग कई कामों में करते हैं।
काश! वह आधुनिक सभ्यता की चपेट में न आएं। मुझे एहसास हो रहा है कि मैं अपना अस्तित्व खोता जा रहा हूँ। कहीं मुश्किल से ही नजर आता हूँ।
भोज में मेरी खोज नहीं है। और स्वच्छ भारत अभियान ने तो मेरी उपयोगिता ही खत्म कर दी। अब वह दिन दूर नहीं जब मैं इतिहास बन जाऊँगा। अंत में -
"मैं हूँ। लोटा , अपना अस्तित्व खोता। "

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