शीर्षक : खौल रही है, यह धरती
रचना तिथि :22 अप्रैल 2017
खौल रही है, यह धरती
कुछ बोल रही है, यह धरती
हे आदम! सच कब तलक छिपाओगे
आने वाली गर्मी में, तुम झुलस जाओगे
ठंड से कप कपाओगे,
और जब प्यास लगेगी तुमको
पानी की बूंद न खोज पाओगे
धूप से तपेगी जब, यह धरती
कोई क्रीम काम ना आएगा
बहुत खेल चुके तुम प्रकृति से
अब यह तुम पर कहर ढाएगा
जो धरती थी ,तुम्हारी माता
उसके सीने को ही तुम ने काटा
पुत्र ,कुपुत्र निकल गए तुम
बोलो अब मां क्या करती
कुछ बोल रही है ,यह धरती
खौल रही है, यह धरती
बहुत बना चुके हथियार तुम
अब सजा भुगतने हो, तैयार तुम
वक्त है अब भी संभल जाओ
वरना मानव तू बहुत पछताएगा
हंसती दुनिया, जब होगी वीरान
इंसा, इंसा को न ढूंढ पाएगा
©ANKUR DUTTA JHA
रचना तिथि :22 अप्रैल 2017
खौल रही है, यह धरती
कुछ बोल रही है, यह धरती
हे आदम! सच कब तलक छिपाओगे
आने वाली गर्मी में, तुम झुलस जाओगे
ठंड से कप कपाओगे,
और जब प्यास लगेगी तुमको
पानी की बूंद न खोज पाओगे
धूप से तपेगी जब, यह धरती
कोई क्रीम काम ना आएगा
बहुत खेल चुके तुम प्रकृति से
अब यह तुम पर कहर ढाएगा
जो धरती थी ,तुम्हारी माता
उसके सीने को ही तुम ने काटा
पुत्र ,कुपुत्र निकल गए तुम
बोलो अब मां क्या करती
कुछ बोल रही है ,यह धरती
खौल रही है, यह धरती
बहुत बना चुके हथियार तुम
अब सजा भुगतने हो, तैयार तुम
वक्त है अब भी संभल जाओ
वरना मानव तू बहुत पछताएगा
हंसती दुनिया, जब होगी वीरान
इंसा, इंसा को न ढूंढ पाएगा
©ANKUR DUTTA JHA


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